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भारत में पुस्तकालय विधान एवं पुस्तकालय अधिनियम (Library Legislations and Library Acts in India)

पुस्तकालय विधान (Library Legislation) से तात्पर्य उन कानूनों, अधिनियमों, नियमों और विनियमों से है जो केंद्र या राज्य सरकारों द्वारा देश में सार्वजनिक पुस्तकालय सेवाओं के विकास, संवर्धन, वित्तीय प्रबंधन और नियमन के लिए बनाए जाते हैं। यह प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे Bihar Librarian, UGC NET, KVS, NVS) के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।

1. पुस्तकालय विधान की आवश्यकता (Need for Library Legislation)

सार्वजनिक पुस्तकालयों को समाज के सभी वर्गों के लिए नि:शुल्क और व्यवस्थित रूप से संचालित करने के लिए कानूनी ढांचे की आवश्यकता होती है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

• पुस्तकालयों को वैधानिक दर्जा (Legal Status) प्रदान करना।
• पुस्तकालयों का योजनाबद्ध और व्यवस्थित विकास (Systematic Growth) सुनिश्चित करना।
• राज्य सरकार एवं स्थानीय निकायों की जिम्मेदारियों और दायित्वों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना।
• पुस्तकालयों के संचालन के लिए नियमित वित्तीय सहायता (Financial Assistance) एवं उपकर (Cess) की व्यवस्था करना।
• पुस्तकालय सेवाओं के मानकों (Standards) का निर्धारण और नियमन करना।
• राज्य में साक्षरता दर (Literacy Rate) और पठन संस्कृति (Reading Habits) को बढ़ावा देना।

Key Point

डॉ. एस. आर. रंगनाथन (Dr. S. R. Ranganathan) ने 1930 में बनारस में आयोजित 'ऑल एशिया एजुकेशनल कॉन्फ्रेंस' में भारत के लिए पहला मॉडल पब्लिक लाइब्रेरी एक्ट (Model Public Libraries Act) प्रस्तुत किया था। उन्हें भारत में पुस्तकालय विधान का जनक माना जाता है।

2. भारत के प्रमुख केंद्रीय पुस्तकालय विधान (Important Central Library Legislations)

भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर पुस्तकालय और सूचना प्रणाली को सुदृढ़ करने के लिए कई केंद्रीय अधिनियम पारित किए गए हैं:

• Press and Registration of Books Act, 1867: भारत में मुद्रित पुस्तकों और समाचार पत्रों के पंजीकरण को अनिवार्य बनाने वाला कानून।
• Delivery of Books (Public Libraries) Act, 1954: इसके तहत भारत के प्रत्येक प्रकाशक को प्रकाशित पुस्तक की एक-एक प्रति चार निर्दिष्ट डिपॉजिटरी पुस्तकालयों (National Library Kolkata, Connemara Public Library Chennai, Asiatic Society Mumbai, Delhi Public Library) को भेजना अनिवार्य है। 1956 में इसमें संशोधन करके समाचार पत्रों को भी शामिल किया गया।
• The Copyright Act, 1957 (संशोधित 2012): बौद्धिक संपदा और लेखकों के अधिकारों की रक्षा हेतु अधिनियम।
• The Right to Information (RTI) Act, 2005: सूचना का अधिकार अधिनियम जो पुस्तकालयों में सूचना की पारदर्शिता और पहुंच बढ़ाता है।
• The Public Records Act, 1993: सरकारी अभिलेखों के संरक्षण और प्रबंधन से संबंधित कानून।
• The Information Technology Act, 2000: डिजिटल पुस्तकालयों और ई-संसाधनों के विधिक नियमन हेतु।
• Rights of Persons with Disabilities Act, 2016: दिव्यांग व्यक्तियों के लिए सुगम पुस्तकालय सेवाएं (Accessible Library Services) सुनिश्चित करता है।

3. भारतीय राज्यों में सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियमों की सूची (List of State Public Library Acts)

भारत में अब तक 19 राज्यों और 1 केंद्र शासित प्रदेश (कुल 20) में सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम पारित हो चुके हैं:

1. तमिलनाडु (Madras Public Libraries Act) – 1948 (भारत का पहला पुस्तकालय अधिनियम)
2. आंध्र प्रदेश (Andhra Pradesh Public Libraries Act) – 1960
3. कर्नाटक (Karnataka Public Libraries Act) – 1965
4. महाराष्ट्र (Maharashtra Public Libraries Act) – 1967
5. पश्चिम बंगाल (West Bengal Public Libraries Act) – 1979
6. मणिपुर (Manipur Public Libraries Act) – 1988
7. केरल (Kerala Public Libraries Act) – 1989
8. हरियाणा (Haryana Public Libraries Act) – 1989
9. मिजोरम (Mizoram Public Libraries Act) – 1993
10. गोवा (Goa Public Libraries Act) – 1994
11. गुजरात (Gujarat Public Libraries Act) – 2001
12. ओडिशा (Odisha Public Libraries Act) – 2001
13. उत्तराखंड (Uttarakhand Public Libraries Act) – 2005
14. राजस्थान (Rajasthan Public Libraries Act) – 2006
15. उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh Public Libraries Act) – 2006
16. बिहार (Bihar Public Libraries Act) – 2008
17. छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh Public Libraries Act) – 2008
18. अरुणाचल प्रदेश (Arunachal Pradesh Public Libraries Act) – 2009
19. तेलंगाना (Telangana Public Libraries Act) – 2015
20. लक्षद्वीप (Lakshadweep Public Library Regulation) – 2007 (केंद्र शासित प्रदेश)

Key Point

बिहार सार्वजनिक पुस्तकालय और सूचना केंद्र अधिनियम (Bihar Public Libraries Act) वर्ष 2008 में पारित किया गया था। बिहार लाइब्रेरियन परीक्षा के दृष्टिकोण से यह वर्ष और अधिनियम का नाम अत्यंत महत्वपूर्ण है।

4. पुस्तकालय अधिनियमों के प्रमुख उद्देश्य (Objectives of Library Acts)

राज्य पुस्तकालय अधिनियमों का मुख्य उद्देश्य संपूर्ण राज्य में एक नेटवर्कयुक्त पुस्तकालय संरचना की स्थापना करना है:

• राज्य, जिला, ब्लॉक और ग्राम स्तर पर सार्वजनिक पुस्तकालयों की श्रृंखला स्थापित करना।
• पुस्तकालय प्रणाली के लिए स्थायी वित्तीय स्रोत (निधि और उपकर) की गारंटी देना।
• पुस्तकालय प्रशासन एवं प्रबंधन (Administration & Management) के लिए राज्य पुस्तकालय परिषद (State Library Council) का गठन करना।
• ज्ञान, सांस्कृतिक विरासत और सूचना संसाधनों का स्थायी संरक्षण करना।
• शासन एवं स्थानीय निकायों (Panchayats and Municipalities) के मध्य सहयोग बढ़ाना।

5. पुस्तकालय उपकर (Library Cess) का प्रावधान

सार्वजनिक पुस्तकालयों के स्थायी वित्तपोषण के लिए कुछ राज्यों के अधिनियमों में संपत्ति कर, गृह कर या अन्य करों पर अतिरिक्त पुस्तकालय उपकर (Cess) लगाने का प्रावधान किया गया है:

• तमिलनाडु (1948): मकान/संपत्ति कर पर उपकर (Property Tax / House Tax)।
• आंध्र प्रदेश (1960): गृह कर और संपत्ति कर पर उपकर।
• कर्नाटक (1965): संपत्ति कर, वाहन कर, प्रवेश कर और भूमि राजस्व पर उपकर।
• केरल (1989): संपत्ति कर पर उपकर।
• हरियाणा (1989): संपत्ति कर और गृह कर पर उपकर।

Key Point

महाराष्ट्र (1967), पश्चिम बंगाल (1979), और बिहार (2008) जैसे राज्यों के पुस्तकालय अधिनियमों में 'पुस्तकालय उपकर' (Library Cess) का प्रावधान नहीं है; इन राज्यों में पुस्तकालयों का वित्तपोषण सीधे राज्य सरकार के बजट और अनुदान से होता है।

6. पुस्तकालय विधान का महत्त्व (Importance of Library Legislation)

पुस्तकालय विधान समाज के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है:

• कानूनी मान्यता: पुस्तकालयों को सरकार द्वारा स्थायी दर्जा मिलता है, जिससे वे किसी व्यक्ति या निजी संस्था की इच्छा पर निर्भर नहीं रहते।
• मानकीकरण (Standardization): पुस्तकालय सेवाओं, कर्मचारियों के वेतनमान, और बुनियादी ढांचे में एकरूपता और गुणवत्ता आती है।
• निःशुल्क सूचना तक पहुँच: यह लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करता है क्योंकि नागरिक बिना किसी भेदभाव के ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।
• सतत शिक्षा (Lifelong Learning): औपचारिक शिक्षा समाप्त होने के बाद भी नागरिकों के लिए स्व-अध्ययन का द्वार खुला रखता है।

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